अन्नू कानावत ने विपरीत सामाजिक सोच के बावजूद, एमबीए (कृषि) तक पढ़ाई पूरी की और मशरूम में अनुसंधान प्रवृत्ति के कारण ‘मशरूम लेडी’ के रूप में पहचान बनाई। उनकी कहानी, उन्हीं की जुबानी।
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले (वर्तमान में शाहपुरा जिला) की जहाजपुर तहसील के आमल्दा गांव में, 1990 की 11 सितम्बर को मेरा जन्म हुआ। दादाजी जसवन्त सिंह के साथ पिताजी भंवर सिंह खेती आदि का काम संभालते। दादीजी सुशीला कंवर और मां रतन कंवर गृहस्थी के मोर्चे के साथ हमें बेहतर बनने के लिए संस्कार देतीं। औरतों को घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। फिर भी जिद करके दादाजी के साथ खेतों में जाती और कृषि का पाठ पढ़ती। जैसे-तैसे 9 साल की उम्र में स्कूल जाने लगी। उन दिनों सब्जी वाला खेल बहुत भाता। बड़े पापा विक्रम सिंह और बड़ी मां मुन्ना कंवर ने मुझे आगे पढ़ाने की ठान ली।
बड़ी मां ने पढ़ाई का खर्चा दिया। पढ़ाई के लिए नाना-नानी के पास चित्तौड़गढ़ जिले के सिंघोला गांव जाना पड़ा। बारहवीं कृषि में की। वहां मास्टरजी भंवरलाल कुम्हार ने कृषि में आगे पढ़ने को प्रेरित किया। 2011 में उदयपुर के कृषि विश्वविद्यालय से बीएससी कृषि की उपाधि प्राप्त की। वहां खेलकूद में राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची। 2014 में गुजरात के पालनपुर से एमबीए (कृषि) की पढ़ाई पूरी की।
उपाधि मिलते ही जयपुर के सुरेश ज्ञान विहार विश्वविद्यालय से शिक्षण कार्य से सम्बद्ध हो गई। इसके चेयरमैन सुनील शर्मा और चीफ मेंटर डॉ. सुधांशु ने मेरी कृषि शोध प्रवृत्ति को पंख लगाए। 2016 में पराक्रमसिंह राठौड़ से विवाह हुआ। वे एडवोकेट हैं। उनका प्रोत्साहन सदैव मेरी कार्य ऊर्जा रहा।
कृषि क्षेत्र में पढ़ाई के साथ, दादाजी से घुड़सवारी और शूटिंग विरासत में मिले। खेलकूद में अव्वल रहने की सोच के कारण ही मुझे समझ आया कि खेती उत्पादन तक ही सीमित नहीं है। कृषि उत्पाद के मूल्य संवर्धन और बिक्री में पारंगत होने से ही वास्तविक लाभ मिलता है।
सफ़र मशरूम नवाचारों का
मशरूम की खेती कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली है। इसमें पानी की जरूरत कम होती है। रेगिस्तान जैसे सूखे इलाकों के लिए बहुत फायदेमंद है। राजस्थान के किसान कम बारिश और सूखे के कारण परेशान होते हैं। इसलिए मशरूम की खेती में उनकी रुचि बढ़ने लगी है। विवाह पूर्व 2016 में जन्मभूमि आमल्दा गांव में, आमल्दा ऑर्गेनिक फूड्स एंड रिसर्च सेंटर की शुरुआत की।
विवाह के बाद, जयपुर रहने लगी, तब प्रतापनगर में इसकी दूसरी लघु इकाई अस्तित्व में आई। इसमें मशरूम उत्पादन, उससे दवाइयां बनाने और अनुसंधान के साथ, आमल्दा की अनुसंधान इकाई में समय-समय पर जाकर, वहां भी ये कार्य आगे बढ़ाती। मेरे विवाह के बाद आमल्दा के अनुसंधान केन्द्र को मां संभालती है। लघु भ्राता गजेन्द्र सिंह मेरे हर नवाचारी कदम में साथ रहे। हम मशरूम की नई किस्मों पर शोध करते हैं, उन्नत तकनीकें विकसित करते हैं। मशरूम से उपचार के लिए दवाइयां विकसित करके, उन्हें मरीजों को उपलब्ध करवाना हमारी प्राथमिकता है। मशरूम की खेती के लिए अनुसंधान केन्द्र ग्रामीणों को प्रशिक्षण देने के साथ, उन्हें इस क्षेत्र में बाजार से जोड़ने में मदद करता है।
स्वरोजगार के लिए, प्रशिक्षण कार्यक्रमों में ग्रामीण महिलाओं की रुचि अधिक देखी गई है। गांवों में महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर भी काम करती हूं। इससे मशरूम उत्पादन में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। इन कोशिशों से विशिष्ट पहचान मिली। 2020 में भारत सरकार ने स्टार्टअप के रूप में हमारी संस्था को 15 लाख रुपये की सहायता दी। 2022 में एमएसएमई ने जयपुर में सम्मानित किया। हाल ही ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव’ में मुझे, मशरूम नवाचारों के सफ़र को राष्ट्रीय स्तर पर साझा करने का अवसर मिला। और हां, इन सबसे मैं आत्मनिर्भर हो गई। हर माह औसत आय 50 हजार रुपये से अधिक हो जाती है।
कुछ खास मशरूम
कीड़ा जड़ी (कॉर्डिसेप्स) मशरूम विश्व बाज़ार में करीब 2 लाख रुपये कीमत में मिलता है। इसके उत्पादन के अत्यन्त लघु प्रयासों के साथ, इससे शुगर और कैंसर की दवाइयां बनाने में प्रारंभिक सफ़लता नज़र आई है। ऑयस्टर मशरूम के उत्पादन और इससे साइटिका की दवाई बनाने का काम जारी है। हमारे द्वारा उत्पादित बटन मशरूम को क्रेता उत्पादन स्थल से ही ले जाते हैं। मशरूम उत्पाद और इनसे निर्मित दवाइयां अनेक प्रदेशों में जा रही हैं। इन्हें विदेशी बाजारों में पहुंचाने के लिए यथासंभव प्रयास करूंगी। अन्य मशरूमों का उत्पादन शुरू करने के साथ, मेरा जीवन लक्ष्य है कि ग्रामीण महिलाएं भी मेरी तरह आत्मनिर्भर बनें। मैंने उनकी विकट स्थितियां अपने बचपन से देखी हैं। उनकी बेहतरी के लिए कुछ कर पाई, तभी मैं अपने मिनख जीवन को सार्थक समझूंगी।
पर्यावरण संरक्षण
राजसमंद जिले के पिपलांत्री मॉडल की वैश्विक पहचान है। पद्मश्री श्यामसुन्दर पालीवाल का पिपलांत्री मॉडल देखने गई तो उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए मार्गदर्शन किया। उनकी प्रेरणा से आमल्दा गांव में खनन कार्य रुकवाने में सहभागी बनी। वहां पानी के खराबे को रोककर पौधे लगवाने शुरू किए। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में, जल्द ही बहुत कुछ करने पर मंथन जारी है।
सम्पर्क कर सकते हैं
अन्नू कानावत, 263/931, सेक्टर-26, प्रताप नगर, जयपुर-302033 (राजस्थान), मुख्य अनुसंधान केन्द्र: गांव आमल्दा-311605, तहसील जहाजपुर, जिला शाहपुरा (राजस्थान), ईमेल: mldaorganic@gmail.com, मोबाइल: 9982720599